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मौजूदा वक्त की जरूरत हैं ‘मुंंशी प्रेमचंद्र’

भीमराव अंबेडकर विवि के कुलपति प्रो. अरविंद दीक्षित और तपन ग्रुप के चेयरमेन सुरेशचन्द्र गर्ग ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

सच का उजाला नेटवर्क
आगरा। मुंशी प्रेमचंद के वक्त से लेकर अब तक एक सदी बीत चुकी है, परंतु समाज की स्थितियों में ज्यादा बदलाव नहीं है। उस वक्त किसान परेशान था, यही स्थिति अभी भी है। सच कहें, तो पहले किसान आत्महत्या नहीं कर रहा था लेकिन अब बताने की जरूरत नहीं। ऐसे में मुंशी प्रेमचंद जैसे लेखन की जरूरत महसूस होती है।


डॉ. भीमराव अंबेडकर विवि के जुबली हॉल मंच में तपन ग्रुप के सहयोग से सोमवार को प्रेमचंद महोत्सव के उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद वक्त की जरूरत हैं। कार्यक्रम में कसाईबाड़ा और तिरिया चरित्र रचनाओं के लेखक शिवमूर्ति, वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव और कहानीकार एवं संस्कृतिकर्मी नूर जहीर मुख्य वक्ता थे। वक्ताओं ने मौजूदा दौर और प्रेमचंद के साहित्य का प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। सभी ने माना कि मुंशी जी ने भले ही ये रचनाएं तब की स्थितियों को देखकर रचीं, लेकिन समाज की स्थित में अब तक ज्यादा बदलाव नहीं आया है।

आलोचक वीरेंद्र यादव का कहना था कि प्रेमचंद ने गुलाम भारत में लिखना सीखा। वो जोखिम का वक्त था। जोखिम सरकार की जगह सामंतों और पुरोहितों के गिरोह से ज्यादा था। कथावाचक और संस्कृतिकर्मी नूर जहीर का कहना था कि प्रेमचंद स्त्री-पुरूष के बीच प्रेम के पक्षधर थे। उनका प्रेम समाज की विसंगतियों से जूझते हुए स्त्री-पुरुष के बीच का था। आयोजन समिति अध्यक्ष प्रो. ब्रजेश चंद्रा ने कार्यक्रम की जरूरत पर प्रकाश डाला। कोषाध्यक्ष अनिल शुक्ल ने बताया कि आयोजन 32 दिन तक चलेगा और इसके जरिए प्रेमचंद की विरासत को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी। इससे पहले डॉ. भीमराव अंबेडकर विवि के कुलपति प्रो. अरविंद दीक्षित और तपन ग्रुप के चेयरमेन सुरेशचन्द्र गर्ग ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। अध्यक्षता साहित्यिक पत्रिका कथादेश के संपादक हरिनारायण ने की। मीडिया प्रभारी योगेंद्र दुबे ने बताया कि अगला कार्यक्रम दो अगस्त को डीईआई कला संकाय में होगा। इसमें हिन्दी कहानी और प्रेमचंद की विरासत विषय पर गोष्ठी होगी।

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amit tomer

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