नजरिया राजनीती

‘अच्छे दिन’ लाने के लिए पाँच साल माँगे थे, तीन साल गुजर गए हैं और सरकार के पास ऐसी कोई ‘चमत्कारिक उपलब्धि’ नहीं

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी जब जीतकर आई थी, तब उसने ‘अच्छे दिन’ लाने के लिए पाँच साल माँगे थे. तीन साल गुजर गए हैं और सरकार के पास ऐसी कोई ‘चमत्कारिक उपलब्धि’ नहीं है, जिसे वह पेश कर सके. पर बड़ी ‘एंटी इनकंबैंसी’ भी नहीं है. इसी वजह से सरकार भविष्य की ग़ुलाबी तस्वीर खींचने की कोशिश कर रही है.

यह साल बारहवीं पंचवर्षीय योजना का आख़िरी साल था. पिछली सरकार ने इस साल 10 फ़ीसदी आर्थिक विकास दर हासिल करने का लक्ष्य रखा था. वह लक्ष्य तो दूर, पंचवर्षीय योजनाओं की कहानी का समापन भी इस साल हो गया.

अब भारतीय जनता पार्टी ने ‘संकल्प से सिद्धि’ कार्यक्रम बनाया है, जिससे एक नए किस्म की सांस्कृतिक पंचवर्षीय योजना का आग़ाज़ हुआ है.

संकल्प से सिद्धि’ का रूपक है- 1942 की अगस्त क्रांति से लेकर 15 अगस्त 1947 तक स्वतंत्रता प्राप्ति के पाँच साल की अवधि का. रोचक बात यह है कि बीजेपी ने कांग्रेस से यह रूपक छीनकर उसे अपने सपने के रूप में जनता के सामने पेश कर दिया है. सन 2022 में भारतीय स्वतंत्रता के 75 साल पूरे हो रहे हैं और बीजेपी उसे भुनाना चाहती है.

पाँच साल लंबा सपना

मोदी सरकार ने ख़ूबसूरती के साथ देश की जनता को पाँच साल लंबा एक नया स्वप्न दिया है. पिछले साल के बजट में वित्तमंत्री ने 2022 तक भारत के किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प किया था. उस संकल्प से जुड़े कार्यक्रमों की घोषणा भी की गई है.

सवाल है कि क्या 2022 का स्वप्न 2019 की बाधा पार करने के लिए है या ‘अच्छे दिन’ नहीं ला पाने के कारण पैदा हुए असमंजस से बचने की कोशिश है? सवाल यह भी है कि क्या जनता उनके सपनों को देखकर मग्न होती रहेगी, उनसे कुछ पूछेगी नहीं?

मोदी सरकार देश के मध्य वर्ग और ख़ासतौर से नौजवानों के सपनों के सहारे जीतकर आई थी. उनमें आईटी क्रांति के नए ‘टेकी’ थे, अमेरिका में काम करने वाले एनआरआई और दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद और मुम्बई के नए प्रोफ़ेशनल, काम-काजी लड़कियाँ और गृहणियाँ भी.

पिछले तीन साल में बीजेपी का हिंदू राष्ट्रवाद उभर कर सामने आया है. देखना होगा कि गाँवों और कस्बों के अपवार्ड मूविंग नौजवान को अब भी उनपर भरोसा है या नहीं.

2019 को पार करने की रणनीति

जून 2014 में सोलहवीं लोकसभा के पहले अभिभाषण में राष्ट्रपति ने जिन नए कार्यक्रमों की घोषणा की थी उनमें देश में 100 विश्वस्तरीय स्मार्ट शहरों को स्थापित करने का कार्यक्रम भी था. यह कार्यक्रम भी 2022 में पूरा होगा. सरकार कहना चाहती है कि केवल पाँच साल काफ़ी नहीं होते.

डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया और बेटी बचाओ जैसे तमाम नए कार्यक्रम सरकार ने बनाए हैं. ये कार्यक्रम भविष्य के भारत के स्वप्न हैं. सवाल इस रणनीति को लेकर है. प्रधानमंत्री ने अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में सरकार की मौजूदा सफलताओं का विवरण दिया भी है, पर यह विवरण बहुत स्पष्ट नहीं हैं. यह भी साफ़ नहीं है कि इन्हें हासिल किस तरह किया जाएगा.

अर्थ-व्यवस्था का ठहराव

आर्थिक रूप से देश महत्वपूर्ण मोड़ पर है. हम सात फ़ीसदी के आसपास ठहरे हैं. नोटबंदी के कारण असंगठित क्षेत्र के कारोबार पर उल्टा असर पड़ा है और आर्थिक संवृद्धि प्रभावित हुई है.

इस साल जुलाई से सरकार ने टैक्स सुधार के रूप में जीएसटी को लागू किया है. इसके कारण भी कुछ समय तक आर्थिक संवृद्धि प्रभावित होगी. स्वदेशी पूँजी निवेश गति पकड़ नहीं पा रहा है. इसकी एक बड़ी वजह है बैंकों के प्रबंधन की बदहाली.

तकरीबन पूरा बैंकिग कारोबार देशी उद्यमियों को दिए गए कर्ज़ों की वक़्त से अदायगी नहीं हो पाने की वजह से बदहाल है. प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश बढ़ा जरूर है, पर वह इतना ज़्यादा नहीं है कि विकास दर तेज़ गति पकड़े.

विदेशी निवेशकों को आर्थिक सुधारों, श्रमिक कानूनों में बदलाव और देश के इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास का इंतज़ार है. विदेशी एजेंसियाँ भारत सरकार के बार-बार अनुरोध के बावजूद क्रेडिट रेटिंग सुधारने को तैयार नहीं है.

इन सब बातों से नए रोज़गार तैयार करने में तेज़ी नहीं आ पा रही है. उधर नई पीढ़ी सामने आती जा रही है. देश को तेज़ संवृद्धि के साथ संपदा के वितरण की जरूरत है. सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार हमारी सबसे बड़ी समस्याएं हैं.

सरकार को उस मोड़ का इंतज़ार है, जहाँ से वह ‘अच्छे दिन’ दिखा सके. यह सरकार भावनाओं की लहरों पर सवार होकर आई है और आज भी लहरों पर ही है. जमीन पर दिखाने लायक उपलब्धियाँ उसके पास अब भी नहीं हैं.

चमत्कारिक उपलब्धियाँ यूपीए सरकार की भी नहीं थीं. अलबत्ता साल 2004 से 2009 तक देश में आर्थिक विकास दर आठ से नौ फ़ीसदी तक पहुँच गई थी. 2008 की वैश्विक मंदी के बाद से उसमें भी गिरावट आई.

सच यह भी है कि यूपीए-2 के दौर में आर्थिक सुधारों का काम तकरीबन ठप हो गया था. यूपीए-1 को उसके पहले साल 1991 से 2004 के बीच हुए आर्थिक सुधारों का लाभ भी मिला था. मोदी सरकार को अपनी पूर्ववर्ती सरकार की सुस्ती का ख़ामियाजा भी भुगतना है.

सरकार को लेकर जो सर्वे आ रहे हैं, उनसे लगता है कि मोदी की लोकप्रियता बरकरार है. एक तबके को लगता है कि यह सरकार फ़ैसले करती है. इस तबके का भरोसा बनाए रखने के लिए भी ज़रूरी है कि सरकार ‘ग़ुलाबी भविष्य’ के सपने दिखाए.

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