क्राइम राजनीती

गोरखपुर कांड पर दखल नहीं देगा सुप्रीम कोर्ट

बच्चों की मौत पर अदालत ने कहा, ‘केस यूपी के सरकारी अस्पताल का हैं, हाईकोर्ट जाए याची’

नई दिल्ली, एजेंसी। गोरखपुर अस्पताल आॅक्सीजन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्वत: संज्ञान लेने से इन्कार कर दिया और याचिकाकर्ता से हाईकोर्ट जाने को कहा। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने कहा कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं मामले को देख रहे हैं। हमने टीवी पर उन्हें अस्पताल का दौरा करते देखा है। केस राज्य के अस्पताल का है बेहतर हो कि याचिकाकर्ता संबंधित हाईकोर्ट जाए।
इस फैसले पर कानून के जानकार कहते हैं कि अस्पताल प्रशासन और आक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी दोनों पर घोर लापरवाही और गैर इरादतन हत्या का मामला बनता है। कंपनी भी नोटिस देने की आड़ लेकर नहीं बच सकती क्योंकि उसे मालूम था कि आक्सीजन सप्लाई रुकने का क्या परिणाम होगा। ये कोई दुर्घटना नहीं थी बल्कि मैनमेड त्रासदी है। अस्पताल प्रशासन को ये भी काफी पहले से पता था कि आक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी को भुगतान नहीं हुआ है और वह आपूर्ति रोक सकती है। कानून में साफ है कि अगर जानबूझकर हुई लापरवाही में किसी की जान जाती है तो दोषी व्यक्ति क्रिमिनल निग्लीजेंस का जिम्मेदार होता है।

कोर्ट ने कहा-सीएम खुद इस मामले को देख रहे हैं

जानकार बोले-हादसा नहीं मैनमेड त्रासदी है यह घटना

‘डाक्टरों को बलि का बकरा बना रही है राज्य सरकार’

गोरखपुर/नई दिल्ली एजेंसी। कल तक जो डॉक्टर कफिल बच्चों के लिए मसीहा थे वह अचानक सरकार की नजरों में खलनायक हो गए। प्रदेश सरकार ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सहायक आचार्य व इंसेफेलाइटिस वार्ड के प्रभारी डॉ. कफिल खान को बर्खास्त कर दिया है। डॉ. कफिल की बर्खास्तगी कई सवाल उल्टे सरकारी की कार्रवाई पर ही खड़े कर रहे। आखिर सरकार इस बर्खास्तगी के पीछे इतनी तेजी क्यों दिखा रही जबकि सरकार के मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक जांच रिपोर्ट आने की बात कह रहे थे। सरकार की कार्रवाई पर दिल्ली एम्स के डाक्टरों ने आरोप लगाया है कि गोरखपुर मामले में डाक्टरों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। एम्स रेजीडेंट डाक्टर्स एसोसिएशन के प्रमुख डा. हरजीत सिंह भाटी ने कहा कि मामला पूरी तरह जन स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही का है और इल्जाम डाक्टरों पर रखा जा रहा है।

केस तो बनता है

वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी कहते हैं कि इस मामले में जिस जिस की जानकारी में था कि अस्पताल में आक्सीजन की कमी है और उससे मरीजों की मौत हो सकती है, उन सभी पर आपराधिक मामला बनता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश एसआर सिंह भी कहते हैं कि कंपनी नोटिस देने भर से नहीं बच सकती। ये क्रिमिनल निग्लीजेंस का केस है। अस्पताल प्रबंधन भी जिम्मेदार है।

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