क्योंकि भारत में शुद्धता से है शाकाहार का संबंध

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सच का उजाला नेटवर्क
आगरा।
पूरी दुनिया में शाकाहार को बढ़ावा देने की बातें कही जा रही हंै, इसके लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। पश्चिमी देशों में इसे प्रगतिशील सोच का प्रतीक माना जाता है, साथ ही पशु कल्याण के मुद्दे से भी जोड़कर देखा जा रहा है। भारत के लिए गर्व की बात हो सकती है कि यहां 30 प्रतिशत से अधिक लोग पूरी तरह शाकाहारी हैं। यह आंकड़ा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) द्वारा 2014 में किए गए सर्वे का है। शाकाहार के मामले में भारत दुनिया के किसी भी देश से बहुत आगे है। हालांकि भारत में शाकाहार के पीछे सोच अन्य देशों से बिल्कुल अलग है। यहां शाकाहार का संबंध सीधे तौर पर शुद्धता से जोड़ा जाता है और कहना नहीं होगा कि यह सोच यहां शाकाहारी लोगों और गैर शाकाहारी लोगों के बीच दूरियां पैदा करती है।
मौजूदा हालात में जब मांस और मांसाहार को लेकर आए दिन विवाद और हिंसा के मामले सामने आ रहे हैं, इस पर विचार करना बेहद जरूरी हो जाता है कि भारत में आखिर क्यों शाकाहारी और गैर-शाकाहारी लोगों के बीच दूरियां बढ़ती नजर आ रही हैं। हमारे यहां रसोई में यह भेद साफ नजर आता है। शहरी पढ़े लिखे वर्ग में भी शाकाहार को लेकर विभाजन बढ़ रहा है। स्कूलों में बच्चो को टिफिन में मांसाहार लाने की अघोषित मनाही है। आफिसों में भी कैंटीन या खाने की जगहों पर मांसाहार लगभग प्रतिबंधित है। इंटरनेशनल कंपनी एस्सार की ओर से मुंबई स्थित अपने मुख्यालय में अप्रैल 2014 नोटिस जारी कर कर्मचारियों से गैर-शाकाहारी भोजन नहीं लाने को कहा गया था ताकि उन बहुसंख्यक कर्मचारियों को दिक्कत न हों जो शाकाहारी हैं।
आईआईटी बांबे के समाजशास्त्र के प्रोफेसर सूर्यकांत वाघमोर लिखते हैं, भारत में शाकाहार की नैतिकता मानवीयता और पशुओं के प्रति करुणा के भाव से नहीं, बल्कि शुद्धता की परंपरा से प्रेरित है। 2013 में अमेरिका, कनाडा और भारत द्वारा कराए गए संयुक्त सर्वे में पाया गया कि उत्तरी अमेरिका और भारत में मांसाहार को लेकर बड़ा अंतर यह है कि कि अमेरिका और कनाडा में जहां शाकाहार के पीछे सार्वभौमिकता, पशु एवं पर्यावरण कल्याण के मु्द्दे हैं, वहीं भारत में शुद्धता, प्रदूषण और परंपरा के मसले हैं। मजे की बात यह है कि पशु कल्याण और पर्यावरण के मुद्दे पर शाकाहारी भारतीय लोगों राय सर्वहारी भारतीयों से बहुत अलग नही है।
भारत में जातिवार नजरिये से देखें तो उच्च जातियों के लोगों के शाकाहारी होने की संभावना अधिक होती है, जबकि अनुसूचित जाति और जनजातियों में गैर-शाकाहारी लोगों संख्या बहुत अधिक अधिक है। दूसरे शब्दों में कहें कि शहरी भारत में उच्च जाति के खाने की आदतों का एक विशिष्ट वर्चस्व है। कई लोग इस विचार का समर्थन करते हैं कि कैंटीन और खाने के स्थल पर शाकाहार का वर्चस्व विशुद्ध रूप से शाहाकार के प्रति सम्मान का है, गैर-शाकाहारी लोगों को भोजन से रोकने का नहीं है।

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